पहला रेप

Sunday, 21 April 2013

मैं डेज़ी हूँ 33 साल की शादी शुदा महिला. मेरी शादी को नौ साल हो चुके हैं. मगर आज भी मैं अपना पहला रेप भूल नहीं पाती हू. तब मैं 23 साल की ही थी गरम खून था. एमए, बी.एड. करने के बाद एक कॉलेज मे लेक्चरार का पार्ट टाइम जॉब मिल गया था. कुच्छ कर दिखाने का जुनून था सो मैं कुच्छ ज़्यादा ही जोश मे अगयी. बी.ए के आन्यूयल एग्ज़ॅम मे ड्यूटी लगी थी मैं जिस रूम मे थी उसमे 35 लड़के और लड़कियाँ एग्ज़ॅम दे रहे थे. उनमे एक आवारा टाइप का लड़का भी था. नाम था राजन. लोग उसे राजा कहकर बुलाते थे. अमीर मा बाप का बिगड़ी हुआ औलाद था. 25-27 साल उम्र होगी मगर अभी भी बी.ए. कर रहा था. एग्ज़ॅम मे वो किताब लेकर नकल करने लगा. मुझे दिखाई दिया तो मैने साथ वाले सर से कंप्लेन की मगर उन्हों ने मुझे चुप रहने को कहा. मगर मैने चुप रहना अपने उसूलों के खिलाफ माना. और जाकर उससे आन्सर शीट और कॉपी छ्चीन ली. "ये आप क्या कर रहे हैं" मैने गुस्से से कहा. "दिख नही रहा क्या?"उसने ढिठाई से कहा. "गेट आउट ऑफ एग्ज़ॅमिनेशन हॉल." "मेडम पूरे कॉलेज मे कोई नहीं है जो मुझ से ऊँची आवाज़ मे बोले" उसने मुझ घूरते हुए कहा"इसलिए अपनी आवाज़ नीचे रख कर बात कीजिए." उसका इतना कहना था कि मैने उसकी कॉपी को पेन से काट कर उसपर कॉमेंट्स लिख दिया. "ऐसा है आप आग से खेल रहीं हैं. अभी जवानी का खूब जोश है. मुझे कुच्छ हुया तो तेरे इस बदन को मसल कर रख दूँगा. मुँह छुपाती फ़िरेगी अपना." कह कर उसने मेरी एक छाती पर उंगली से दबाया. मैं गुस्से से पागल हो गयी. उसकी कॉपी और किताब लेकर प्रिन्सिपल के पास गयी और सारी बात बताई. प्रिन्सिपल भी बात को दबा देना चाहता था मगर मैने चीख चीख कर सब को इकट्ठा कर लिया. पैंसिपल को आख़िर मे उसकी कंप्लेन बुक करके एग्ज़ॅमिनेशन से बाहर करना पड़ा. मगर मैं उसका नाम कॉलेज से रिस्ट्रिकेट करवा कर ही मानी. वो मुझे भद्दी भद्दी गलियाँ वहीं सब के सामने ही देने लगा. मैं अपनी जीत पर फूली नहीं समा रही थी. मगर ये जीत बस कुच्छ दिन की ही रही. शुरू के कुच्छ दिन तो सावधान रही मगर कुच्छ दिन बाद वापस लापरवाह हो गयी. दस दिन बाद बी.एससी. के प्रॅकिकल शुरू हो गये. मेरी ड्यूटी आन्सर शीट्स सम्हालने के लिए लगा दी. उस दिन फ्री होते होते शाम हो गयी. कॉलेज से बस स्टॅंड कुच्छ दूरी पर था. कॉलेज शहर से 5 किमी. दूर बना था. आस पास कोई खास बस्ती नही थी. इसलिए ऑफ टाइम मे जगह कुच्छ सुन सान हो जाता था. उस दिन अपना समान लेकर निकली तो बस स्टॉप पर सिर्फ़ एक आदमी और खड़ा था. मैं जा कर उसके पास खड़ी हो गयी. तभी एक बोलरो तेज़ी से आकर ठीक मेरे सामने रुकी. मेरे साथ खड़े आदमी ने अपनी जेब से रूमाल निकाल कर उस पर कुच्छ डाला और इस से पहले की मैं कुच्छ समझ पाती. उसने गीला रूमाल मेरी मुँह और नाक पर रख दिया. एक भीनी खुश्बू के साथ अंधेरा छाता चला गया. मुझे नहीं मालूम मैं कितनी देर बेहोश रही. जब आँख खुली तो मैने अपने आप कोएक बड़े हॉल मे पाया. चारों ओर अंधेरा था सिर्फ़ सिर के ऊपर एक तेज रोशनी का बल्ब जल रहा था. जिसकी रोशनी सिर्फ़ मे जिस तखत पर पड़ी थी उसके ऊपर ही आरहि थी. मैं उठ कर बैठी तो सबसे पहले जिस चीज़ पर नज़र गयी वो था कि मेरे बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था. मैं तख्त पर बिल्कुल नंगी हालत मे बैठी थी. मेरे दोनो हाथ फ़ौरन मेरे स्तनों को ढकने की कोशिश करने लगे.मैने अपनी टाँगें सिकोड ली जिस से मेरी योनि छुप जाए. तभी हॉल हँसने की आवाज़ से गूँज उठा. मैने इधर उधर देखने की कोशिश की. चारों ओर अंधेरे के कारण कुच्छ भी नहीं दिख रहा था. तभी एक आदमी अंधेरे से रोशनी के दायरे मे आया. वो राजन था. मैं शांति हुई उस से अपने नग्न बदन को छिपाने की कोशिश की. उसने मेरे बालों को मुट्ठी मे पकड़ कर मेरे चेहरे को अपनी तरफ घुमाया. "क्यों, मैने तुझे मना किया था ना कि मुझ से मत उलझ. मगर तू नहीं मानी. अब दिखा वो तेवर.देखता हूँ कौन आता है तुझे बचाने के लिए."उसने मेरे होंठों को ज़बरदस्ती अपने होंठों पर दबा दिया. मैं अपना मुँह हटाना चाहती थी मगर उसने बालों को सख्ती से पकड़ रखा था. मेरा सिर तीव्र दर्द कर रहा था. "आब तुझे पता चलेगा राजा से पंगा लेने का अंजाम. तेरे शरीर को तब तक हम मसलेंगे जब तक हमारा मन नहीं भर जाए." कहकर उसने मेरे उरोजो पर से हाथ हटा दिए. मैं उस से भिड़ गयी. तो उसका एक झन्नतेंडार थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा मुझे चारों ओर तारे नज़र आने लगे. मेरा विरोध एक दम से भाप बन कर उड़ गया. तभी हॉल मे रोशनी हो गयी. मैने देखा कि वाहा उसके अलावा सात आदमी और मोजूद थे. वो सारे राजन की गॅंग के ही आदमी थे. मुझे महसूस हो गया कि अब मेरी हालत पिंजरे मे बंद किसी चिड़िया जैसी हो गयी है. अब ये आठों आदमी मेरे पूरे बदन को नोच डालेंगे. कमरे मे सारे आदमी नग्न थे उनके लंड मुझे चोदने के लिए बेताबी से खड़े थे. मैने अपने आप को राजा से छुड़ाया और खाट से उठकर भागने लगी. मुझे एक दरवाजा नज़र आया तो उस ओर लपकी. सारे आदमी हंस रहे थे. "भाग जितना भाग सकती है भाग. बच नहीं पाएगी हमसे." "अपनी हालत पर तो नज़र डाल. इस हालत मे अगर बाहर भी निकल गयी तो क्या बाहर वाले तुझे बिना मसले छ्चोड़ देंगे?" मैने अपने बदन पर नज़र डाली. मगर फिर भी उनके हाथों से बचने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही थी. तभी राजा ने कहा "बहुत हो गया यारों अब ज़्यादा समय खराब ना करके शुरुआत की जाए. मुझे पकड़ कर एक आदमी घसीट ता हुआ राजन तक ले गया. राजन ने मेरे गर्दन को पकड़ कर नीच की ओर दबाया. "देख मेरे लंड को देख. ये आज तेरे अंदर जाएगा. अब इसे मुँह मे लेकर प्यार कर" मैं लगातार संघर्ष कर रही थी. तभी पीछे वाले आदमी ने मेरे स्तनों को ज़ोर ज़ोर से मसला. ना चाहते हुए भी मेरे मुँह से चीख निकल गयी. "छ्चोड़ छ्चोड़ मुझे नहीं तो तुम सबको जैल भिजवा दूँगी" "तू ऐसा कोई काम नहीं करेगी. ये सामने तीतू है इसने कई लोगों को उपर भिजवा दिया है. तुझे अगर अपनी जान प्यारी हो तो तू कुच्छ भी नही करेगी. अगर पोलीस स्टेशन गयी तो भी कोई रिपोर्ट नहीं लिखेगा. क्योंकि तुझे चोदने मे डीएसपी का बेटा भी शामिल है." कई हाथ मेरे नग्न बदन को नोच रहे थे. मैं बस कसमसा रही थी. फिर उन्हों ने मुझे घुटनो के बल बिठा दिया और एक ने मेरे गले को दबाया. मुझे छॅट्पाटा कर अपना मुँह खोलना पड़ा. राजा का लिंग मेरी जीभ के उपर से सरकता हुआ अंदर चला गया. उसके लिंग से पेशाब की स्मेल आ रही थी. मुझे ज़ोर की उबकाई आई. मगर लोगों ने मुझे सख्ती से पकड़ रखा था इसलिए. बर्दास्त करने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था. उसने मेरे सिर को मजबूती से अपने हाथों से थामा और अपना लिंग अंदर बाहर करने लगा. उसका लिंग काफ़ी अंदर तक चोट कर रहा था. बाकी आदमीने मेरे स्तनों को मसल मसल कर लाल सुर्ख कर दिए थे. मेरे बॉल खुल कर चेहरे पर बिखर गये थे. कुच्छ देर तक मुझे इसी तरह रगड़ने के बाद मुझे खीचते हुए तख्त पर ले गये. मुझे उसपर पटक दिया और मेरे हाथ पैरों को फैला चार तरफ से चार आदमियों ने पकड़ रखा था. मेरा पूरा बदन उनके सामने नुचे जाने के लिए तैयार था. सबसे पहले राजा मेरे ऊपर आया मैं अब तक कुँवारी थी. आज मेरे कुंवारेपन को वो आदमी लूटने जा रहा था जिसे मैं दुनिया मे सब्से ज़्यादा नफ़रत करने लगी थी. उसने मेरी दोनो टाँगों को पकड़ कर छत की तरफ उठा दिया. "प्लीज़ नहीं, मुझे छ्चोड़ दो मैं. किसी को कुच्छ भी नहीं कहूँगा. मेरी शादी होने वाली है. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ. प्लीज़. प्लीज़" मगर उनमे से किसी को भी मुझपर कोई रहम नहीं आया. भूखे जानवरों से रहम की उम्मीद करना भी बेवकूफी का काम था. राजा ने अपना लिंग मेरी योनि पर लगा कर ज़ोर का धक्का दिया. मगर लिंग अंदर ना जा कर फिसल गया. अगली बार मेरी योनि की फांकों को उंगलियों से अलग कर के उनके बीच मे अपने लिंग को सताया और एक ज़ोर का झटका लगाया. उसका लिंग मेरी योनि को रगड़ता हुया आधा अंदर चला गया. मैं ज़ोर से चीख उठी. "उईईईई माआआ मर गइई" मैं तो ज़ोर ज़ोर से रोने लगी. "मैं मययायर जौउउन्गीईइ. प्लेअसस्स्ससे मुझे छोड़ दो" राजा ने अपने लिंग को वापस पूरा बाहर निकाला. उसके लिंग पर हल्का हल्का खून लगा था. "देखा साली कंवारी थी." राजा ने सबको दिखाते हुए कहा."आज तो खूब मज़ा आएगा" मैं तड़प रही थी. कई हाथ मुझ चारों ओर से पकड़ रखे थे इस लिए मैं हिल भी नहीं पा रही थी. राजा के लिंग के बाहर निकलने के कारण कुच्छ आराम हुआ. मगर राजा ने वापस जैसे ही लिंग को मेरी योनि के ऊपर लगाया मैं सिहर उठी. इस बार उसने और ज़्यादा ज़ोर से मेरी योनि मे पेल दिया. मैं दर्द से बिलबिला उठी. मेरी आँखों से पानी बहने लगा. मुँह खुला हुआ था मगर मानो मुझ पर बेहोशी सी च्छाई हुई थी. आस पास सब धुँधला दिख रहा था. कानो मे आस पास के लोगों की आवाज़ें ऐसी लग रही थी मानो काफ़ी दूर से आ रही हों. कुच्छ देर तक राजा पूरा लिंग अंदर कर के रुका रहा. जब वापस उसने अपने लिंग को कुच्छ बाहर निकाल कर धक्का लगाया तो जैसे मेरी चेतना वापस आई. मैं ,मछ्लि की तरह छटपटाने लगी. राजा को कोई परवाह नही थी. उसने अपने लिंग को गति देदी. वो ज़ोर ज़ोर से मुझे ठोकने लगा. मेरे मुँह से "आआअहह ऊऊओह नहियीईईन्न्न ओफफफ्फ़ प्लस्सस्स" जैसी आवाज़ें निकल रही थी. कुच्छ देर उस तरह से चोदने के बाद मुझे उल्टा कर के चौपाया बना कर पीछे की तरफ से मेरी योनि पर हमला बोल दिया. एक ने सामने आकर मेरे मुँह मे अपना लिंग घुसा दिया. अब तो मेरा किसी भी तरह का एतराज बेमानी हो गया था. मैं तो बस उन्हें जो चाहिए वो देकर उनके चंगुल से छ्छूटना चाहती थी. अब मेरे मुँह मे और योनि मे दोनो तरफ से धक्के लगने लगे. एक अंदर डालता तो दूसरा बाहर निकलता और मैं दोनो के बीच झूल रही थी. लगभग पंद्रह मिनूट तक धक्के लगाने के बाद राजा के लिंग की पिचकारी ने वीर्य से मेरी योनि को भर दिया. राजा की जगह दूसरे आदमी ने ले ली. सामने वाले आदमी ने अपने लिंग को मेरे मुँह मे पूरा थेल दिया. जो की मेरे गले के अंदर जा कर फँस गया. मैं साँस लेने को च्चटपाटने लगी. उसका लिंग फूल कर झटके लेने लगा. मेरी आँखे उबल आई. उसके लिंग से गाढ़ा गाढ़ा गर्म वीर्य मेरे गले से होकर पेट मे जाने लगा. उसने मेरे सिर को ऐसे पकड़ रखा था कि मैं सिर हिला भी नहीं पा रही थी. "ले पी. मेरे वीर्य को पी. बहुत गोरूर था तुझेआपने ऊपर कैसी कुतिया बनी हुई है आज." उसने अपने लिंग को बाहर निकाल लिया. लिंग से आखरी धार मेरे मुँह पर पड़ी. वो मेरे होंठों के ऊपर से बहते हुए नीचे टपकने लगा. अब उनलोगों ने मुझे उठा कर खड़ा किया. एक जो मेरी योनि मे लिंग राजा के बाद घुसा रखा था वो तख्त पर लेट गया. उसका लिंग उपर की ओर तना हुआ था. मुझे बाकी लोगों ने गुड़िया की तरह जांघों से पकड़ कर उठा रखा था. मुझे उठाकर उसके लिंग पर रखने लगे तो एक ने उसके लिंग को मेरी योनि से सटा दिया. फिर सबने एक साथ मुझे छोड़ दिया. मैं धाम से उसके लिंग पर बैठ गयी. और उसका लिंग पूरा मेरी योनि मे समा गया. उसने मुझे खींच कर अपने सीने से सटा लिया. तभी दो हाथ मेरे हिप्स को अलग कर दिए और मेरे गुदा द्वार पर एक लिंग सॅट गया. मैं उनकी अगली हरकत के बारे मे सोच कर घबडा गयी. मगर मुझे सम्हलने का मौका दिए बगैर ही एक लिंग मेरे गंद के अंदर चला गया. मैं चीखने लगी. मगर कोई नहीं था मुझे बचाने वाला. मेरी हालत सॅंडविच की तरह हो गयी थी. उपर नीचे से धक्के महसूस करने लगी. एक ने मेरे सिर को पकड़ कर उठाया और उस छेद को भी खाली नहीं रहने दिया. मुँह मे भी एक लिंग प्रवेश कर गया. बाकी लोग मेरे बदन पर हाथ फेर रहे थे. बाकी जो दो आदमी थे उन्हों ने अपने अपने लिंग मेरे हाथों मे पकड़ा दिए. मैं उनके लिंग पर हाथ फिराने लगी. राजा और उसका वो साथी जो मेरा मुख मैथुन पहले कर चुक्का था दोनो पास बैठे मेरी हालत का मज़ा ले रहे थे. एक साथ मैं पाँच आदमियों को झेल रही थी.पाँचों एक एक करके वीर्य से मुझे भीगा दिए. मेरा पूरा बदन वीर्य से भीगा हुआ था. हर जगह चिपचिपाहट थी. मगर मुझमे इतनी भी ताक़त नहीं बची थी कि मैं अपने बदन को सॉफ करती. मगर ये तो अभी शुरुआत थी. रात भर मुझे बुरी तरह मसल्ते रही. अलग अलग टीम बना कर अलग अलग तरह से मेरी ठुकाई हुई. सुबह तक तो मेरी हालत बहुत ही नाज़ुक हो गयी. थी. मेरी हालत देख कर सारे मुझे वहाँ पर नंगी हालत मे छ्चोड़ कर वहाँ से भाग लिए. मैं कई घंटों तक वहाँ पड़ी रही. फिर किसी तरह गिडते पड़ते अपने कपड़ों को ढूँढ निकाला. ब्रा और पॅंटी तो तार तार हो रही थी. किसी तरह बाकी कपड़ो मे अपने को छुपाते हुए मैं वापस आई. तो दोस्तो अमीर और ग़रीब का फासला मुझे तब मालूम पड़ा

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