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छोटा भाई

Sunday, 28 April 2013

मेरा नाम आशा है । मेरा छोटा भाई दसवी मैं पढ़ता है । वह गोरा चिट्टा और करीब मेरे ही बराबर लम्बा भी है । मैं इस समय24 की हूँ और वह 21का । मुझे भैय्या के गुलाबी होंठ बहूत प्यारे लगते हैं । दिल करता है कि बस चबा लूं । पापा गल्फ़ में है और माँ गवर्नमेंट जोब में । माँ जब जोब की वजह से कहीं बाहर जाती तो घर मैं बस हम दो भाई बहन ही रह जाते थे । मेरे भाई का नाम अमित है और वह मुझे दीदी कहता है । एक बार मान कुछ दिनों के लिये बाहर गयी थी । उनकी इलेक्शन ड्यूटी लग गयी थी । माँ को एक हफ़्ते बाद आना था । रात मैं डिनर के बाद कुछ देर टी वी देखा फ़िर अपने-अपने कमरे मैं सोने के लिये चले गये।करीब एक आध घण्टे बाद प्यास लगने की वजह से मेरी नींद खुल गयी । अपनी सीधे टेबल पर बोटल देखा तो वह खाली थी । मैं उठ कर किचन मैं पानी पीने गयी तो लौटते समय देखा कि अमित के कमरे की लाइट ओन थी और दरवाज़ा भी थोड़ा सा खुला था । मुझे लगा कि शायद वह लाइट ओफ़ करना भूल गया है मैं ही बन्द कर देती हूँ । मैं चुपके से उसके कमरे में गयी लेकिन अन्दर का नजारा देखकर मैं हैरान हो गयी ।अमित एक हाथ मैं कोई किताब पकड़ कर उसे पढ़ रहा था और दूसरा हाथ से अपने तने हुए लण्ड को पकड़ कर मुठ मार रहा था । मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि इतना मासूम लगने वाल यह छोकरा ऐसा भी कर सकता है । मैं दम साधे चुपचाप खड़ी उसकी हरकत देखती रही, लेकिन शायद उसे मेरी उपस्थिति का आभास हो गया । उसने मेरी तरफ़ मुँह फेरा और दरवाजे पर मुझे खड़ा देखकर चौंक गया। वह बस मुझे देखता रहा और कुछ भी ना बोल पाया । फिर उसने मुँह फ़ेर कर किताब तकिये के नीचे छुपा दी । मुझे भी समझ ना आया कि क्या करूं । मेरे दिल मैं यह ख्याल आया कि कल से यह लड़का मुझसे शर्मायेगा और बात करने से भी कतरायेगा । घर मैं इसके अलावा और कोई है भी नहीं जिससे मेरा मन बहलता । मुझे अपने दिन याद आये। मैं और मेरा एक कज़िन इसी उमर के थे जब से हमने मज़ा लेना शुरू किया था तो इसमें कौन सी बड़ी बात थी अगर यह मुठ मार रहा था ।मैं धीरे-धीरे उसके पास गयी और उसके कंधे पर हाथ रखकर उसके पास ही बैठ गयी। वह चुपचाप लेटा रहा । मैंने उसके कंधो को दबाते हुई कहा, "अरे यार अगर यही करना था तो कम से कम दरवाज़ा तो बन्द कर लिया होता" । वह कुछ नहीं बोला, बस मुँह दूसरी तरफ़ किये लेटा रहा । मैंने अपने हाथों से उसका मुँह अपनी तरफ़ किया और बोली "अभी से ये मज़ा लेना शुरू कर दिया। कोई बात नहीं मैं जाती हूँ तो अपना मज़ा पूरा कर ले। लेकिन जरा यह किताब तो दिखा। मैंने तकिये के नीचे से किताब निकाल ली। यह हिन्दी मैं लिखे मस्तराम की किताब थी। मेरा कज़िन भी बहूत सी मस्तराम की किताबें लाता था और हम दोनों ही मजे लेने के लिये साथ-साथ पढ़ते थे। चुदाई के समय किताब के डायलोग बोल कर एक दूसरे का जोश बढ़ाते थे।जब मैं किताब उसे देकर बाहर जाने के लिये उठी तो वह पहली बार बोला, "दीदी सारा मज़ा तो आपने खराब कर दिया, अब क्या मज़ा करुंगा।"अरे! अगर तुमने दरवाज़ा बन्द किया होता तो मैं आती ही नहीं।"और अगर आपने देख लिया था तो चुपचाप चली जाती। अगर मैं बहस मैं जीतना चाहती तो आसानी से जीत जाती लेकिन मेरा वह कज़िन करीब ६ मंथ्स से नहीं आया था इसलिये मैं भी किसी से मज़ा लेना चाहती ही थी। अमित मेरा छोटा भाई था और बहूत ही सेक्सी लगता था इसलिये मैंने सोचा कि अगर घर में ही मज़ा मिल जाये तो बाहर जाने की क्या जरूरत? फिर अमित का लौड़ा अभी कुंवारा था। मैं कुँवारे लण्ड का मज़ा पहली बार लेती, इसलिये मैंने कहा, "चल अगर मैंने तेरा मज़ा खराब किया है तो मैं ही तेरा मज़ा वापस कर देती हूँ। फिर मैं पलंग पर बैठ गयी और उसे चित लिटाया और उसके मुर्झाये लण्ड को अपनी मुट्ठी में लिया। उसने बचने की कोशिश की पर मैंने लण्ड को पकड़ लिया था। अब मेरे भाई को यकीन हो चुका था कि मैं उसका राज नहीं खोलूंगी, इसलिये उसने अपनी टांगे खोल दी ताकि मैं उसका लण्ड ठीक से पकड़ सकूँ। मैंने उसके लण्ड को बहूत हिलाया-डूलाया लेकिन वह खड़ा ही नहीं हुआ। वह बड़ी मायूसी के साथ बोला "देखा दीदी अब खड़ा ही नहीं हो रहा है।"अरे! क्या बात करते हो? अभी तुमने अपनी बहन का कमाल कहाँ देखा है। मैं अभी अपने प्यारे भाई का लण्ड खड़ा कर दूंगी। ऐसा कह मैं भी उसके बगल में ही लेट गयी। मैं उसका लण्ड सहलाने लगी और उससे किताब पढ़ने को कहा। "दीदी मुझे शर्म आती है। "साले अपना लण्ड बहन के हाथ में देते शर्म नहीं आयी। मैंने ताना मारते हुए कहा "ला मैं पढ़ती हूँ। और मैंने उसके हाथ से किताब ले ली । मैंने एक स्टोरी निकाली जिसमे भाई बहन के डायलोग थे। और उससे कहा, "मैं लड़की वाला बोलूँगी और तुम लड़के वाला। मैंने पहले पढ़ा, "अरे राजा मेरी चूचियों का रस तो बहूत पी लिया अब अपना बनाना शेक भी तो टेस्ट कराओ" ।"अभी लो रानी पर मैं डरता हूँ इसलियेकि मेरा लण्ड बहूत बड़ा है, तुम्हारी नाजुक कसी चूत में कैसे जायेगा?और इतना पढ़कर हम दोनों ही मुस्करा दिये क्योंकि यह हालत बिलकुल उलटे थे। मैं उसकी बड़ी बहन थी और मेरी चूत बड़ी थी और उसका लण्ड छोटा था। वह शर्मा गया लेकिन थोड़ी सी पढ़ायी के बाद ही उसके लण्ड मैं जान भर गयी और वह तन कर करीब ६ इँच का लम्बा और १५ । इँच का मोटा हो गया। मैंने उसके हाथ से किताब लेकर कहा, "अब इस किताब की कोई जरूरत नहीं । देख अब तेरा खड़ा हो गया है । तो बस दिल मैं सोच ले कि तू किसी की चोद रहा है और मैं तेरी मु्ठ मार देती हूँ" ।मैं अब उसके लण्ड की मु्ठ मार रही थी और वह मज़ा ले रहा था । बीच बीच मैं सिस्कारियां भी भरता था । एकाएक उसने चूतड़ उठा कर लण्ड ऊपर की ओर ठेला और बोला, "बस दीदी" और उसके लण्ड ने गाढ़ा पानी फेंक दिया जो मेरी हथेली पर गिरा । मैं उसके लण्ड के रस को उसके लण्ड पर लगाती उसी तरह सहलाती रही और कहा, "क्यों भय्या मज़ा आया""सच दीदी बहूत मज़ा आया" । "अच्छा यह बता कि ख़्यालों मैं किसकी ले रहे थे?" "दीदी शर्म आती है । बाद मैं बताऊँगा" । इतना कह उसने तकिये मैं मुँह छुपा लिया ।"अच्छा चल अब सो जा नींद अच्छी आयेगी । और आगे से जब ये करना हो तो दरवाज़ा बन्द कर लिया करना" । "अब क्या करना दरवाज़ा बन्द करके दीदी तुमने तो सब देख ही लिया है" ।"चल शैतान कहीं के" । मैंने उसके गाल पर हलकी सी चपत मारी और उसके होंठों को चूमा । मैं और किस करना चाहती थी पर आगे के लिये छोड़ कर वापस अपने कमरे में आ गयी । अपनी सलवार कमीज उतार कर नाइटी पहनने लगी तो देखा कि मेरी पैंटी बुरी तरह भीगी हुयी है । अमित के लण्ड का पानी निकालते-निकालते मेरी चूत ने भी पानी छोड़ दिया था । अपना हाथ पैंटी मैं डालकर अपनी चूत सहलाने लगी ऊंगलियों का स्पर्श पाकर मेरी चूत फ़िर से सिसकने लगी और मेरा पूरा हाथ गीला हो गया । चूत की आग बुझाने का कोई रास्ता नहीं था सिवा अपनी उँगली के । मैं बेड पर लेट गयी । अमित के लण्ड के साथ खेलने से मैं बहूत एक्साइटिड थी और अपनी प्यास बुझाने के लिये अपनी बीच वाली उँगली जड़ तक चूत मैं डाल दी । तकिये को सीने से कसकर भींचा और जान्घों के बीच दूसरा तकीया दबा आंखे बन्द की और अमित के लण्ड को याद करके उँगली अन्दर बाहर करने लगी । इतनी मस्ती चढ़ी थी कि क्या बताये, मन कर रहा था कि अभी जाकर अमित का लण्ड अपनी चूत मैं डलवा ले । उँगली से चूत की प्यास और बढ़ गयी इसलिये उँगली निकाल तकिये को चूत के ऊपर दबा औन्धे मुँह लेट कर धक्के लगाने लगी । बहुत देर बाद चूत ने पानी छोड़ा और मैं वैसे ही सो गयी ।सुबह उठी तो पूरा बदन अनबुझी प्यास की वजह से सुलग रहा था । लाख रगड़ लो तकिये पर लेकिन चूत मैं लण्ड घुसकर जो मज़ा देता है उसका कहना ही क्या । बेड पर लेटे हुए मैं सोचती रही कि अमित के कुँवारे लण्ड को कैसे अपनी चूत का रास्ता दिखाया जाये । फिर उठ कर तैयार हुयी । अमित भी स्कूल जाने को तैयार था । नाश्ते की टेबल हम दोनों आमने-सामने थे । नजरें मिलते ही रात की याद ताजा हो गयी और हम दोनों मुस्करा दिये । अमित मुझसे कुछ शर्मा रहा था कि कहीं मैं उसे छेड़ ना दूँ । मुझे लगा कि अगर अभी कुछ बोलूँगी तो वह बिदक जायेगा इसलिये चाहते हुई भी ना बोली । चलते समय मैंने कहा, "चलो आज तुम्हे अपने स्कूटर पर स्कूल छोड़ दूँ" । वह फ़ौरन तैयार हो गया और मेरे पीछे बैठ गया । वह थोड़ा सकुचाता हुआ मुझसे अलग बैठा था । वह पीछे की स्टेपनी पकड़े था । मैंने स्पीड से स्कूटर चलाया तो उसका बैलेंस बिगड़ गया और सम्भालने के लिये उसने मेरी कमर पकड़ ली । मैं बोली, "कसकर पकड़ लो शर्मा क्यों रहे हो?""अच्छा दीदी" और उसने मुझे कसकर कमर से पकड़ लिया और मुझसे चिपक सा गया । उसका लण्ड खड़ा हो गया था और वह अपनी जान्घों के बीच मेरे चूतड़ को जकड़े था ।"क्या रात वाली बात याद आ रही है अमित""दीदी रात की तो बात ही मत करो । कहीं ऐसा ना हो कि मैं स्कूल मैं भी शुरू हो जाऊँ" । "अच्छा तो बहूत मज़ा आया रात में""हाँ दीदी इतना मज़ा जिन्दगी मैं कभी नहीं आया । काश कल की रात कभी खत्म ना होती । आपके जाने के/की बाद मेरा फ़िर खड़ा हो गया था पर आपके हाथ मैं जो बात थी वो कहाँ । ऐसे ही सो गया" ।"तो मुझे बुला लिया होता । अब तो हम तुम दोस्त हैं । एक दूसरा के काम आ सकते हैं" ।"तो फ़िर दीदी आज राख का प्रोग्राम पक्का" ।"चल हट केवल अपने बारे मैं ही सोचता है । ये नहीं पूछता कि मेरी हालत कैसी है? मुझे तो किसी चीज़ की जरूरत नहीं है? चल मैं आज नहीं आती तेरे पास।"अरे आप तो नाराज हो गयी दीदी । आप जैसा कहेंगी वैसा ही करुंगा । मुझे तो कुछ भी पता नहीं अब आप ही को मुझे सब सिखाना होगा" ।तब तक उसका स्कूल आ गया था । मैंने स्कूटर रोका और वह उतरने के बाद मुझे देखने लगा लेकिन मैं उस पर नज़र डाले बगैर आगे चल दी । स्कूटर के शीशे मैं देखा कि वह मायूस सा स्कूल में जा रहा है । मैं मन ही मन बहूत खुश हुयी कि चलो अपने दिल की बात का इशारा तो उसे दे ही दिया ।शाम को मैं अपने कालेज से जल्दी ही वापस आ गयी थी । अमित २ बजे वापस आया तो मुझे घर पर देखकर हैरान रह गया । मुझे लेटा देखकर बोला, "दीदी आपकी तबीयत तो ठीक है?" "ठीक ही समझो, तुम बताओ कुछ होमवर्क मिला है क्या" "दीदी कल सण्डे है ही । वैसे कल रात का काफी होमवर्क बचा हुआ है" । मैंने हंसी दबाते हुए कहा, "क्यों पूरा तो करवा दिया था । वैसे भी तुमको यह सब नहीं करना चाहिये । सेहत पर असर पढ़ता है । कोई लड़की पटा लो, आजकल की लड़कियाँ भी इस काम मैं काफी इंटेरेस्टेड रहती हैं" । "दीदी आप तो ऐसे कह रही हैं जैसे लड़कियाँ मेरे लिये सलवार नीचे और कमीज ऊपर किये तैयार है कि आओ पैंट खोलकर मेरी ले लो" । "नहीं ऐसी बात नहीं है । लड़की पटानी आनी चाहिये" ।फिर मैं उठ कर नाश्ता बनाने लगी । मन मैं सोच रही थी कि कैसे इस कुँवारे लण्ड को लड़की पटा कर चोदना सिखाऊँ? लंच टेबल पर उससे पूछा, "अच्छा यह बता तेरी किसी लड़की से दोस्ती है?""हाँ दीदी सुधा से" ।"कहाँ तक""बस बातें करते हैं और स्कूल मैं साथ ही बैठते हैं" ।मैंने सीधी बात करने के लिये कहा, "कभी उसकी लेने का मन करता है?''
""दीदी आप कैसी बात करती हैं" । वह शर्मा गया तो मैं बोली, "इसमे शर्माने की क्या बात है । मुट्ठी तो तो रोज मारता है । ख़्यालों मैं कभी सुधा की ली है या नहीं सच बता" । "लेकिन दीदी ख़्यालों मैं लेने से क्या होता है" । "तो इसका मतलब है कि तो उसकी असल में लेना चाहता है" । मैंने कहा ।"उससे ज्यादा तो और एक है जिसकी मैं लेना चाहता हूँ, जो मुझे बहूत ही अच्छी लगती है" । "जिसकी कल रात ख़्यालों मैं ली थी" उसने सर हिलाकर हाँ कर दिया पर मेरे बार-बार पूछने पर भी उसने नाम नहीं बताया । इतना जरूर कहा कि उसकी चूदाई कर लेने के बाद ही उसका नाम सबसे पहले मुझे बतायेगा । मैंने ज्यादा नहीं पूछा क्योंकि मेरी चूत फ़िर से गीली होने लगी थी । मैं चाहती थी कि इससे पहले कि मेरी चूत लण्ड के लिये बेचैन हो वह खुद मेरी चूत मैं अपना लण्ड डालने के लिये गिड़गिड़ाये। मैं चाहती थी कि वह लण्ड हाथ में लेकर मेरी मिन्नत करे कि दीदी बस एक बार चोदने दो । मेरा दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा था इसलिये बोली, "अच्छा चल कपड़े बदल कर आ मैं भी बदलती हूँ" ।वह अपनी यूनीफोर्म चेंज करने गया और मैंने भी प्लान के मुताबिक अपनी सलवार कमीज उतार दी । फिर ब्रा और पैंटी भी उतार दी क्योंकि पटाने के मदमस्त मौके पर ये दिक्कत करते । अपना देसी पेटीकोट और ढीला ब्लाउज़ ही ऐसे मौके पर सही रहते हैं । जब बिस्तर पर लेटो तो पेटीकोट अपने/अपनी आप आसानी से घुटने तक आ जाता है और थोड़ी कोशिश से ही और ऊपर आ जाता है । जहाँ तक ढीलें ब्लाउज़ का सवाल है तो थोड़ा सा झुको तो सारा माल छलक कर बाहर आ जाता है । बस यही सोच कर मैंने पेटीकोट और ब्लाउज़ पहना था ।वह सिर्फ़ पायजामा और बनियान पहनकर आ गया । उसका गोरा चित्त चिकना बदन मदमस्त करने वाला लग रहा था । एकाएक मुझे एक आइडिया आया । मैं बोली, "मेरी कमर मैं थोड़ा दर्द हो रहा है जरा बाम लगा दे" । यह बेड पर लेटने का पर्फेक्ट बहाना था और मैं बिस्तर पर पेट के बल लेट गयी । मैंने पेटीकोट थोड़ा ढीला बांधा था इस लिये लेटते ही वह नीचे खिसक गया और मेरी बीच की दरार दिखाये देने लगी । लेटते ही मैंने हाथ भी ऊपर कर लिये जिससे ब्लाउज़ भी ऊपर हो गया और उसे मालिश करने के लिये ज्यादा जगह मिल गयी । वह मेरे पास बैठ कर मेरी कमर पर (आयोडेक्स पैन बाम) लगाकर धीरे धीरे मालिश करने लगा । उसका स्पर्श (तच) बड़ा ही सेक्सी था और मेरे पूरे बदन में सिहरन सी दौड़ गयी । थोड़ी देर बाद मैंने करवट लेकर अमित की और मुँह कर लिया और उसकी जान्घ पर हाथ रखकर ठीक से बैठने को कहा । करवट लेने से मेरी चूचियों ब्लाउज़ के ऊपर से आधी से ज्यादा बाहर निकाल आयी थी । उसकी जान्घ पर हाथ रखे रखे ही मैंने पहले की बात आगे बढ़ाई, "तुझे पता है कि लड़की कैसे पटाया जाता है?""अरे दीदी अभी तो मैं बच्चा हूँ । यह सब आप बतायेंगी तब मालूम होगा मुझे" । आयोडेक्स लगने के दौरान मेरा ब्लाउज़ ऊपर खींच गया था जिसकी वजह से मेरी गोलाइयाँ नीचे से भी झांक रही थी । मैंने देखा कि वह एकटक मेरी चूचियों को घूर रहा है । उसके कहने के अन्दाज से भी मालूम हो गया कि वह इस सिलसिले मैं ज्यादा बात करना चाह रहा है।"अरे यार लड़की पटाने के लिये पहले ऊपर ऊपर से हाथ फेरना पड़ता है, ये मालूम करने के लिये कि वह बूरा तो नहीं मानेगी" । "पर कैसे दीदी" । उसने पूछा और अपने पैर ऊपर किये । मैंने थोड़ा खिसक कर उसके लिये जगह बनायी और कहा, "देख जब लड़की से हाथ मिलाओ तो उसको ज्यादा देर तक पकड़ कर रखो, देखो कब तक नहीं छुटाती है । और जब पीछे से उसकी आँख बन्द कर के पूछों कि मैं कौन हूँ तो अपना केला धीरे से उसके पीछे लगा दो । जब कान मैं कुछ बोलो तो अपना गाल उसके गाल पर रगड़ दो । वो अगर इन सब बातों का बूरा नहीं मानती तो आगे की सोचों" ।अमित बड़े ध्यान से सुन रहा था । वह बोला, "दीदी सुधा तो इन सब का कोई बूरा नहीं मानती जबकि मैंने कभी ये सोच कर नहीं किया था । कभी कभी तो उसकी कमर मैं हाथ डाल देता हूँ पर वह कुछ नहीं कहती" । "तब तो यार छोकरी तैयार है और अब तो उसके साथ दूसरा खेल शुरू कर" । "कौन सा दीदी" "बातों वाला । यानी कभी उसके सन्तरो की तारीफ करके देख क्या कहती है । अगर मुस्करा कर बूरा मानती है तो समझ ले कि पटाने मैं ज्यादा देर नहीं लगेगी" ।"पर दीदी उसके तो बहुत छोटे-छोटे सन्तरे हैं । तारीफ के काबिल तो आपके है" । वह बोला और शर्मा कर मुँह छुपा लिया । मुझे तो इसी घड़ी का इंतजार था । मैंने उसका चेहरा पकड़ कर अपनी और घूमते हुए कहा, "मैं तुझे लड़की पटाना सीखा रही हूँ और तो मुझी पर नजरें जमाये है" ।"नहीं दीदी सच मैं आपकी चूचियों बहूत प्यारी है । बहुत दिल करता है" । और उसने मेरी कमर मैं एक हाथ डाल दिया । "अरे क्या करने को दिल करता है ये तो बता" । मैंने इठला कर पूछा ।"इनको सहलाने का और इनका रस पीने का" । अब उसके हौसले बुलन्द हो चुके थे और उसे यकीन था कि अब मैं उसकी बात का बूरा नहीं मानूँगी । "तो कल रात बोलता । तेरी मुठ मारते हुए इनको तेरे मुँह मैं लगा देती । मेरा कुछ घिस तो नहीं जाता । चल आज जब तेरी मुठ मारूंगी तो उस वक्त अपनी मुराद पूरी कर लेना" । इतना कह उसके पायजामा मैं हाथ डालकर उसका लण्ड पकड़ लिया जो पूरी तरह से तन गया था । "अरे ये तो अभी से तैयार है" ।तभी वह आगे को झुका और अपना चेहरा मेरे सीने मैं छुपा लिया । मैंने उसको बांहों मैं भरकर अपने करीब लिटा लिया और कस के दबा लिया । ऐसा करने से मेरी चूत उसके लण्ड पर दबने लगी । उसने भी मेरी गर्दन मैं हाथ डाल मुझे दबा लिया । तभी मुझे लगा कि वो ब्लाउज़ के ऊपर से ही मेरी लेफ़्ट चूचींयाँ को चूस रहा है । मैंने उससे कहा "अरे ये क्या कर रहा है? मेरा ब्लाउज़ खराब हो जायेगा" ।उसने झट से मेरा ब्लाउज़ ऊपर किया और निप्पल मुँह मैं लेकर चूसना शुरू कर दिया। मैं उसकी हिम्मत की दाद दिये बगैर नहीं रह सकी । वह मेरे साथ पूरी तरह से आजाद हो गया था । अब यह मेरे ऊपर था कि मैं उसको कितनी आजादी देती हूँ ।.”अगर मैं उसे आगे कुछ करने देती तो इसका मतलब था कि मैं ज्यादा बेकरार हूँ चुदवाने के लिये और अगर उसे मना करती तो उसका मूड़ खराब हो जाता और शायद फ़िर वह मुझसे बात भी ना करे । इस लिये मैंने बीच का रास्ता लिया और बनावटी गुस्से से बोली, "अरे ये क्या तो तो जबरदस्ती करने लगा । तुझे शर्म नहीं आती" ।"ओह्ह दीदी आपने तो कहा था कि मेरा ब्लाउज़ मत खराब कर । रस पीने को तो मना नहीं किया था इसलिये मैंने ब्लाउज़ को ऊपर उठा दिया" । उसकी नज़र मेरी लेफ़्ट चूचींयाँ पर ही थी जो कि ब्लाउज़ से बाहर थी । वह अपने को और नहीं रोक सका और फ़िर से मेरी चूचींयाँ को मुँह मैं ले ली और चूसने लगा । मुझे भी मज़ा आ रहा था और मेरी प्यास बढ़ रही थी । कुछ देर बाद मैंने जबरदस्ती उसका मुँह लेफ़्ट चूचींयाँ से हटाया और राइट चूचींयाँ की तरफ़ लेते हुए बोली, "अरे साले ये दो होती हैं और दोनों मैं बराबर का मज़ा होता है" ।उसने राइट मम्मे को भी ब्लाउज़ से बाहर किया और उसका निप्पल मुँह मैं लेकर चुभलाने लगा और साथ ही एक हाथ से वह मेरी लेफ़्ट चूचींयाँ को सहलाने लगा । कुछ देर बाद मेरा मन उसके गुलाबी होंठों को चूमने को करने लगा तो मैंने उससे कहा, "कभी किसी को किस किया है?" "नहीं दीदी पर सुना है कि इसमें बहूत मज़ा आता है" । "बिल्कुल ठीक सुना है पर किस ठीक से करना आना चाहिये" ।कैसे"उसने पूछा और मेरी चूचींयाँ से मुँह हटा लिया । अब मेरी दोनों चूचियों ब्लाउज़ से आजाद खुली हवा मैं तनी थी लेकिन मैंने उन्हे छिपाया नहीं बल्कि अपना मुँह उसकेउसकी मुँह के पास लेजा कर अपने होंठ उसके होंठ पर रख दिये फ़िर धीरे से अपने होंठ से उसके होंठ खोलकर उन्हे प्यार से चूसने लगी । करीब दो मिनट तक उसके होंठ चूसती रही फ़िर बोली ।"ऐसे" ।वह बहूत एक्साइटिड हो गया था । इससे पहले कि मैं उसे बोलूँ कि वह भी एक बार किस करने की प्रक्टीस कर ले, वह खुद ही बोला, "दीदी मैं भी करूं आपको एक बार" "कर ले" । मैंने मुस्कराते हुए कहा ।अमित ने मेरी ही स्टाइल मैं मुझे किस किया । मेरे होंठों को चूसते समय उसका सीना मेरे सीने पर आकर दबाव डाल रहा था जिससे मेरी मस्ती दो गुणी हो गयी थी । उसका किस खत्म करने के बाद मैंने उसे अपने ऊपर से हटाया और बांहों मैं लेकर फ़िर से उसके होंठ चूसने लगी । इस बार मैं थोड़ा ज्यादा जोश से उसे चूस रही थी । उसने मेरी एक चूचींयाँ पकड़ ली थी और उसे कस कसकर दबा रहा था । मैंने अपनी कमर आगे करके चूत उसके लण्ड पर दबायी । लण्ड तो एकदम तन कर आयरन रोड हो गया था । चुदवाने का एकदम सही मौका था पर मैं चाहती थी कि वह मुझसे चोदने के लिये भीख माँगें और मैं उस पर एहसान करके उसे चोदने की इजाजत दूँ । ।मैं बोली, "चल अब बहूत हो गया, ला अब तेरी मुठ मार दूँ" । "दीदी एक रिक्वेस्ट करूँ" "क्या" मैंने पूछा । "लेकिन रिक्वेस्ट ऐसी होनी चाहिये कि मुझे बुरा ना लगे" ।ऐसा लग रहा था कि वह मेरी बात ही नहीं सुन रहा है बस अपनी कहे जा रहा है । वह बोला, "दीदी मैंने सुना है कि अन्दर डालने मैं बहूत मज़ा आता है । डालने वाले को भी और डलवाने वाले को भी । मैं भी एक बार अन्दर डालना चाहता हूँ" ।"नहीं अमित तुम मेरे छोटे भाई हो और मैं तुम्हारी बड़ी बहन" । "दीदी मैं आपकी लूँगा नहीं बस अन्दर डालने दीजिये" । "अरे यार तो फ़िर लेने मैं क्या बचा" । "दीदी बस अन्दर डालकर देखूँगा कि कैसा लगता है, चोदूंगा नहीं प्लीज़ दीदी" ।मैंने उस पर एहसान करते हुए कहा, "तुम मेरे भाई हो इसलिये मैं तुम्हारी बात को मना नहीं कर सकती पर मेरी एक सर्त है । तुमको बताना होगा कि अकसर ख़्यालों मैं किसकी चोदते हो?" और मैं बेड पर पैर फैला कर चित लेट गयी और उसे घुटने के बल अपने ऊपर बैठने को कहा । वह बैठा तो उसके पायजामा के ज़र्बन्द को खोलकर पायजामा नीचे कर दिया । उसका लण्ड तन कर खड़ा था । मैंने उसकी बांह पकड़ कर उसे अपने ऊपर कोहनी के बल लिटा लिया जिससे उसका पूरा वज़न उसके घुटने और कोहनी पर आ गया । वह अब और नहीं रूक सकता था । उसने मेरी एक चूचींयाँ को मुँह मैं भर लिया जो की ब्लाउज़ से बाहर थी । मैं उसे अभी और छेड़ना चाहती थी । सुन अमित ब्लाउज़ ऊपर होने से चुभ रहा है । ऐसा कर इसको नीचे करके मेरे सन्तरे धाप दे" । "नहीं दीदी मैं इसे खोल देता हूँ" । और उसने ब्लाउज़ के बटन खोल दिये। अब मेरी दोनों चुचियां पूरी नंगी थी । उसने लपक कर दोनों को कब्जे मैं कर लिया । अब एक चूचींयाँ उसके मुँह मैं थी और दूसरी को वह मसल रहा था । वह मेरी चूचियों का मज़ा लेने लगा और मैंने अपना पेटीकोट ऊपर करके उसके लण्ड को हाथ से पकड़ कर अपनी गीली चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया । कुछ देर बाद लण्ड को चूत के मुँह पर रखकर बोली, "ले अब तेरे चाकू को अपने ख़रबूज़े पर रख दिया है पर अन्दर आने से पहले उसका नाम बता जिसकी तो बहूत दिन से चोदना चाहता है और जिसे याद करके मुठ मारता है" । वह मेरी चूचियों को पकड़ कर मेरे ऊपर झुक गया और अपने होंठ मेरे होंठ पर रख दिये । मैं भी अपना मुँह खोलकर उसके होंठ चूसने लगी । कुछ देर बाद मैंने कहा, "हाँ तो मेरे प्यारे भाई अब बता तेरे सपनों की रानी कौन है" ।"दीदी आप बुरा मत मानियेगा पर मैंने आज तक जितनी भी मुठ मारी है सिर्फ़ आपको ख़्यालों मैं रखकर" ।"हाय भय्या तो कितना बेशर्म है । अपनी बड़ी बहन के बारे मैं ऐसा सोचता था" । "ओह्ह दीदी मैं क्या करूं आप बहूत खूबसूरत और सेक्सी है । मैं तो कब से आपकी चूचियों का रस पीना चाहता था और आपकी चूत मैं लण्ड डालना चाहता था । आज दिल की आरजू पूरी हुयी" । और फ़िर उसने शर्मा कर आंखे बन्द करके धीरे से अपना लण्ड मेरी चूत मैं डाला और वादे के मुताबिक चुपचाप लेट गया ।"अरे तो मुझे इतना चाहता है । मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि घर मैं ही एक लण्ड मेरे लिये तड़प रहा है । पहले बोला होता तो पहले ही तुझे मौका दे देती" । और मैंने धीरे-धीरे उसकी पीठ सहलानी शुरू कर दी । बीच-बीच मैं उसकी गाँड भी दबा देती ।"दीदी मेरी किस्मत देखिये कितनी झान्टू है । जिस चूत के लिये तड़प रहा था उसी चूत में लण्ड पड़ा है पर चोद नहीं सकता । पर फ़िर भी लग रहा है की स्वर्ग मैं हूँ" । वह खुल कर लण्ड चूत बोल रहा था पर मैंने बूरा नहीं माना । "अच्छा दीदी अब वादे के मुताबिक बाहर निकालता हूँ" । और वह लण्ड बाहर निकालने को तैयार हुआ ।मैं तो सोच रही थी कि वह अब चूत मैं लण्ड का धक्का लगाना शुरू करेगा लेकिन यह तो ठीक उलटा कर रहा था । मुझे उस पर बड़ी दया आयी । साथ ही अच्छा भी लगा कि वादे का पक्का है । अब मेरा फ़र्ज़ बनता था कि मैं उसकी वफादारी का इनाम अपनी चूत चुदवाकर दूँ । इस लिये उससे बोली, "अरे यार तूने मेरी चूत की अपने ख़्यालों में इतनी पूजा की है । और तुमने अपना वादा भी निभाया इसलिये मैं अपने प्यारे भाई का दिल नहीं तोड़ूँगी । चल अगर तो अपनी बहन को चोद्कर बहनचोद बनना ही चाहता है तो चोद ले अपनी जवान बड़ी बहन की चूत" ।
मैंने जान कर इतने गन्दे वर्ड्स उसे कहे थे पर वह बूरा ना मान कर खुश होता हुआ बोला, "सच दीदी" । और फ़ौरन मेरी चूत मैं अपना लण्ड धका धक पेलने लगा कि कहीं मैं अपना इरादा ना बदल दूँ ।"तू बहुत किस्मत वाला है अमित" । मैं उसके कुँवारे लण्ड की चूदाई का मज़ा लेते हुए बोली । क्यों दीदी" "अरे यार तू अपनी जिन्दगी की पहली चूदाई अपनी ही बहन की कर रहा है । और उसी बहन की जिसकी तू जाने कबसे चोदना चाहता था" ।"हाँ दीदी मुझे तो अब भी यकीन नहीं आ रहा है, लगता है सपने में चोद रहा हूँ जैसे रोज आपको चोदता था" । फिर वह मेरी एक चूचींयाँ को मुँह मैं दबा कर चूसने लगा । उसके धक्कों की रफ्तार अभी भी कम नहीं हुयी थी । मैं भी काफी दिनों के बाद चुद रही थी इसलिये मैं भी चूदाई का पूरा मज़ा ले रही थी ।वह एक पल रुका फ़िर लण्ड को गहराई तक ठीक से पेलकर ज़ोर-ज़ोर से चोदने लगा । वह अब झड़ने वाला था । मैं भी सातवें आसमान पर पहूँच गयी थी और नीचे से कमर उठा-उठा कर उसके धक्कों का जवाब दे रही थी । उसने मेरी चूचींयाँ छोड़ कर मेरे होंठों को मुँह मैं ले लिया जो कि मुझे हमेशा अच्छा लगता था । मुझे चूमते हुई कस कस कर दो चार धक्के दिये और और "हाय आशा मेरी जान" कहते हुए झड़कर मेरे ऊपर चिपक गया

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कथा देवयानीची -Marathi sexy Story -Devyani

Sunday, 21 April 2013

माझं नाव देवयानी. आज जी कथा मी तुम्हाला सांगणार आहे ती माझ्या जीवनात प्रत्यक्ष घडलेली

आहे. आपल्या तथाकथित सुसंस्कृत समाजात असेही घडू शकते हे सगळयांना समजावे हा हेतु. माझ्या आई-वडीलांची मी एकुलती एक मुलगी. माझे वडील एक सरकारी अधिकारी आहेत. त्यांची सारखी बदली होत असे. त्यामुळे माझी शाळाही बदलत असे. माझी आई तितकी शिकलेली नाही. माझी आई दिसायला सुंदर आहे. मीही आईचंच रूप घेतलेलं आहे. मी चौदा वर्षांची झाले. त्यावेळी मी नववीत शिकत होते. माझा बांधा उंचापुरा होता, तर माझी शरीरयष्टी उफाडयाची होती.   

 

माझी स्तने मोठी होती. वयाच्या मानाने ती अधिकच मोठी दिसत. माझे ढुंगण गरगरीत आणि मोठे होते. त्यामुळे मला चौदा वर्षांची न समजता माझ्या मैत्रीणी मला सोळा-सतरा वर्षांची समजत. वर्गातले शिक्षकही माझ्याकडे रोखून बघत. तेव्हा मला कसे तरीच होत असे. याच वर्षी मला मासिकपाळी सुरू झाली होती. म्हणजे मी तारुण्याच्या उंबरठयावर पाऊल टाकले होते. एक वेगळयाच अनुभुतीने माझ्यात प्रवेश केला होता. जेव्हा मी अंघोळ करत असे तेव्हा मला माझ्या स्तनांवरून हात फिरवावा असे वाटत असे. मनुक्यापेक्षाही लहान बोंडकांना मी चिमटीत धरून दाबत असे तेव्हा गोड शिरशिरी माझ्या साऱ्या अंगातून निघत असे. मग हळुहळू माझा हात माझ्या मांडयांमध्ये जात असे. तेथे कोवळया लवीची जागा आता दाट कुरळया केसांनी घेतली होती. त्यातून हात फिरवितानाही मला कसे तरीच वाटत असे. तेथे हाताने घासावे असे वाटत असे.तशी मी अभ्यासात हुशार होते. सातवीपर्यंत माझा प्रथम वर्ग कधीच चुकला नाही. मात्र आठवीला बीजगणित नावाचा प्रकार आला आणि मला त्याची भीती वाटू लागली. काही करून बीजगणित माझ्या डोक्यात शिरत नसे. माझे बाबा सरकारी नोकरीत असल्याने त्यानाही मला वेळ देणे जमत नव्हते. मी कशीबशी काठावर आठवी पास झाले. तेव्हा बाबाना माझ्या बीजगणिताची काळजी वाटू लागली. तसे दहावीला तर चांगले मार्क्स घ्यायचे होते. शेवटी व्हायचे तेच झाले मी सहामाही परीक्षेत बीजगणितात नापास झाले. तेव्हा मात्र एके दिवशी माझे बाबा आमच्याच शाळेतील गणिताचे शिक्षक देशमाने याना भेटले. देशमाने सुमारे चाळीस एक वर्षांचे असतील. त्यांची पत्नीही दुसऱ्या शाळेत शिक्षिका होती. देशमानेसर वर्गात शिकवताना माझ्याकडे टक लावून पाहत हे मी हेरले होते. त्यानी ताबडतोब माझ्यासाठी खास शिकवणी वर्ग त्यांच्या घरी घेण्याचे मान्य केले. त्याना मुलबाळ कोणी नव्हते.


 

आमची शाळा सकाळच्या सत्रातली असल्याने दुपारी मी रिकामीच असायची. त्याच वेळी देशमानेसरानी मला त्यांच्या घरी येण्यास सांगितले. त्यांची पत्नी संध्याकाळी घरी येत असे. माझी शिकवणी सुरू झाली. दोन दिवस असेच गेले. देशमानेसर मला मन लावून बीजगणित शिकवित असत. त्यामुळे मलाही बीजगणितात रस वाटू लागला. सुमारे तासभर आमची शिकवणी चालायची. एकदा एक अवघड समीकरण शिकविता शिकविता सर माझ्या अगदी बाजुला येऊन बसले. हळुच त्यानी त्यांचा हात माझ्या खांद्यावर ठेवला. आता सर हे जवळ जवळ माझ्या बाबांच्या वयाचे असल्याने मलाही त्यात काही गैर वाटले नाही. उलट मला बरे वाटले. तसेच एका परक्या पुरूषाचा हात प्रथमच माझ्या खांद्यावर पडला होता. सरांच्या शरीराचा पुरूषी गंध मला हवाहवासा वाटू लागला. आता त्यांचा हात माझ्या पाठीवरून फिरू लागला. मी काहीच बोलले नाही. त्यामुळे सराना माझी संमती वाटली. मी ब्रा वापरत होती. सरांचा हात माझ्या टॉपवरूनच ब्राच्या पट्टयांशी चाळा करू लागला. त्यादिवशी मी टॉप व स्कर्ट घातला होता.माझी कानशिलं गरम होऊ लागली होती. रक्तप्रवाह जोरात सुरू झाला होता. त्यामुळे माझी छाती धडधडू लागली होती. त्यामुळे माझे स्तन जोराने खालीवर होऊ लागले होते. काही तरी वेगळे घडत होते हे नक्की. माझ्यासारखेच सराना पण होऊ लागले होते. कारण त्यांचा हात थरथरत होता तर त्यांचे उष्ण श्वास मला माझ्या मानेला जाणवू लागले होते. तेवढयात सरांचा उजवा हात माझ्या काखेतून माझ्या उजव्या स्तनावर आला. मी नखशिखांत हादरले. सरानी हळुच माझा स्तन दाबला. मी काहीच बोलली नाही. माझे गाल लाल झाले होते, तर माझं सारं अंग थरथरू लागलं होतं.मी काहीच बोलत नाही हे पाहून माझी मुक संमती गृहित धरून सरानी पुढच्याच क्षणाला माझ्या ओठांवर आपले ओठ ठेवले. झपाटल्याप्रमाणे त्यानी माझ्या ओठांची, गालांची चुंबने घेण्यास सुरूवात केली. माझे हात त्यांच्या पाठीवर कधी गेले हे मला समजलेच नाही. एका पुरूषाने घेतलेले ते माझे पहिले चुंबन होते. काय होते ते मला समजत नव्हते, पण गंमत येत होती. सुखसंवेदना साऱ्या शरीरात उठत होत्या. हे बरे की वाईट याचा विचार करण्याच्या मी पलीकडे गेले होते. आता सरांचे हात माझ्या दोन्ही स्तनांना कुस्करू लागले. बघता बघता त्यानी माझ्या टॉपची बटने खोलली. आणि ते बघतच राहिले. ब्राच्या आत माझी स्तने तटतटली होती. कुठल्याही क्षणी ती ब्राचे बंध तोडून बाहेर पडतील असे वाटत होते. झटकन सरानी माझी ब्रा वर केली व स्तनांना मोकळे केले. एका आधाशासारखे ते त्यावर तुटून पडले, तोंडात घेऊन चोखू लागले. मी तर सातव्या आस्मानात होते. सर स्तन कुस्करताना जेवढी मजा येत होती, त्याहूनही जास्त मजा आता त्यांच्या चोखण्याने येत होती. मी डोळे बंद करून या अनोख्या सुखाचा आस्वाद घेऊ लागले.अचानक सरानी माझा उजवा हात आपल्या हातात घेतला व तो त्यानी त्यांच्या मांडयांच्या मध्ये ठेवला. मी पाहते तो काय? त्यांचा तो भाग फुगीर झाला होता. मला कठीण वस्तू हाताला लागल्याचा भास झाला.सरानी पायजमा घातलेला होता. अधिक वेळ न घालवता त्यानी पायजाम्याची बटने खोलली. आणि माझ्या हातात त्यांचा जाडजूड लवडा आला. मी आश्चर्याने पाहतच राहिले. एवढा लांब अणि कडक, जणु धगधगती लोखंडी कांब असावी असा तो होता. सरानी माझा हात आपल्या हातात घेऊन त्यावर ठेवला व चामडी खाली-वर करण्यास सांगू लागले. मलाही मजा येऊ लागली. लवडयावरची चामडी मागे सरकताच मला त्याच्या सुपाऱ्याचं दर्शन झालं. लालबुंद व मशरूम सारखा छत्रीचा आकार होता त्याचा. मी माझा हात खाली त्याच्या मुळाशी नेला; तसे सर विव्हळले. ते म्हणाले, शाबास! असंच कर. झटक्यात त्यानी त्यांचा पायजामा खाली केला व आतली चड्डीही खाली सरकवली. लवडयाच्या सभोवती दाट कुरळया केसांचं जंगल होतं. तर त्यांच्या मोठयाल्या गोटया लटकत होत्या. सरानी त्यांच्यावरही माझा हात ठेवला. एखाद्या झपाटलेल्या सारखी मी त्यांचा लवडा कुरवाळत होते. तर सर माझी स्तने दाबत, कुस्करत होते. अचानक त्यानी माझा स्कर्ट वर केला. आता त्यांचा हात माझ्या मांडयांमध्ये आला. मी पांढऱ्या रंगाची चड्डी घातली होती. ती बाजुला करून सरांची बोटे माझ्या पुचीवर पोचली देखील. आता ती माझ्या केसाळ पुचीवर फिरत होती. माझी फट शोधत होती. माझ्या चड्डीचा अडथळा नको म्हणून मीच माझे ढुंगण वर करून सराना चड्डी काढण्यास सांगितले. त्यानी तसे केले. तर मी माझी ब्रा ही काढून टाकली. आता मी सरासमोर संपूर्ण नग्नावस्थेत होती. तसे सरही नागडे झाले. मला जाणवले माझ्या पुचीतून पातळ स्त्राव द्रवत होता.मग अधिक वेळ न घालवता सरानी त्यांचा भला लवडा मोठा माझ्या पुचीच्या तोंडावर ठेवला व ते तो आत घालू लागले. जवळ जवळ पाव भाग तो आत गेला असेल; तेवढयात आत कसला तरी अडथळा जाणवला. तो माझ्या पुचीतला पडदा होता. मग सरानी पुन्हा लवडा बाहेर काढला व जोराचा एक धक्का दिला. त्याबरोबर जोराची कळ माझ्या मांडयात जाणवली. मी नको नको म्हणू लागले. पण सर धक्के मारतच होते. बघता बघता त्यांचा जवळ जवळ आठ इंच लांब लंड माझ्या पुचीत शिरला होता. आता त्यांची झाटे माझ्या झाटांत मिसळली होती. सर माझी स्तने कुस्करत होते, तोंडात घेत होते. आता मला बरे वाटू लागले. कळ नाहीशी झाली. अचानक सरानी त्यांच्या धक्क्यांचा जोर वाढवला व मी आलोऽऽ मीऽऽ आलो! असे ओरडत त्यानी माझ्या पुचीत आपल्या वीर्याच्या पिचकाऱ्या सोडल्या.तसे सर बाजुला बसले व दम खावू लागले. मी तर वेगळयाच नशेत होते. मी सहज खाली पाहिले. तो काय माझ्या पुचीतून रक्त येत होते. मी ते सराना दाखवले. तसे सर म्हणाले, पहिल्यांदा असे होते. घाबरू नकोस. ते असेही म्हणाले, झाले ते होऊन गेले. हे तू कुणाला सांगू नकोस. मग त्यानीच एक जुना टॉवेल घेऊन माझी पुची पुसली व आपला लवडाही. तो आता लहान झाला होता. अशा प्रकारे मी जवानीचा आनंद काय असतो तो लुटला होता.मग सर पुन्हा माझ्याजवळ आले. माझ्या स्तनांना दाबत ते म्हणाले, देवयानी, खरं सांग तुझं वय काय? मी म्हणाले, सर पंधरावं लागलं असेल! तर सर म्हणाले, मला खरं वाटत नाही. अगं माझ्या बायकोचीही स्तनं तुझ्यासारखी नाहीत. खरं सांगू मी तुला पाहिले, तेव्हाच मी तुझा एक ना एक दिवस उपभोग घ्यायचा ठरविले. आज ते मला मिळालं. खरंच मी किती भाग्यवान आहे! सर भडाभडा बोलत होते. एक हात त्यांचा माझ्या पुचीवरूनही फिरत होता. अचानक त्यांचा हात माझ्या दाण्यावर आला. मी तो तेथे दाबून धरला. सर काय समजायचे ते समजले. ते आता बोटाने तेथे घासू लागले. मला मजा येऊ लागली. परम सुखाची कारंजी माझ्या शरीरात उसळली. अऽऽसंऽंच! असंऽऽच!! करा सरऽऽ!! मजा येते, असे म्हणत मी झडले. आयुष्यातील हे माझे पहिले झडणे होते.त्या नंतर मग हे रोजचे सुरू झाले. मी सरांच्या घरी जाताच ते सरळ मला बेडरूममध्ये घेऊन जायचे. मग आम्ही दोघे नागडे व्हायचो. प्रथम आम्ही 69 (इंग्रजी) करायचो. सर आपली जीभ माझ्या पुचीत घालून तिला बुळबुळीत करायचे, माझा दाणा चोखायचे. एकदा तर मी त्यांच्या तोंडातच झडले होते. तर त्यांचा भला मोठा लवडा मी तोंडात घेऊन लॉलीपॉपसारखी चोखायची. त्यांच्या गोटया कुरवाळायची. एकदा सर म्हणाले, देवयानी, मला आज तुझे खालचे शेव्हींग करायचे आहे! मी काय बोलणार? आता पर्यंत मी कधीच माझी झाटं कापली नव्हती. मी नागडीच होते. सरानी लगेच मला बेडवर मांडया फाकवून बसविले. एक जुनी चादर माझ्याखाली अंथरली. त्यानी आपला शेव्हींग कीट काढला. हे सारे थ्रिलींग होते. नवा अनुभव देणारे होते. सरानी प्रथम माझ्या पुचीवरचे मोठे केस कैचीने कापले. मी डोळे बंद करून विव्हळू लागले. नंतर सरानी ब्रशवर क्रीम घेऊन ते माझ्या फाकलेल्या पुचीला लावू लागले. ब्रशचा आणि क्रीमचा थंड स्पर्श मला वेडे करीत होता. माझ्या सर्वांगातून गोड शिरशिऱ्या निघत होत्या. नंतर दाढी करण्याच्या फावडयाने सर माझे शेव्हींग करू लागले. माझी पुची कधीची पाझरू लागली होती. मी पाहिले सरांचा लवडा ताडताड उडया मारू लागला होता. मग सरानी मला उलटे केले. आता माझ ढुंगण त्याच्या समोर होते. एका हाताने माझे कुल्ले फाकवून सरानी माझ्या गांडीवर क्रीम लावले. तेथेही छोटे छोटे केस होते. तेही सरानी शेव्ह करून टाकले. नंतर मला सरळ करून त्यानी माझ्या पुचीसमोर छोटा आरसा धरला. मी पाहिले. एखाद्या लहान मुलीच्या पुचीसारखी माझी पुची तुळतुळीत दिसू लागली होती. सरानी ओल्या फडक्याने ती पुसून काढली. मग सर म्हणाले, देवयानी, तू आता माझं शेव्हींग कर. सरांच्या लवडयाभोवतीही दाट केसांचं कुरण होतंच. सर आडवे झोपले. मग मी कैचीने त्यांची मोठी झाटं कापली. आता सरांचा लवडा अधिकच मोठा दिसू लागला. मग मी ब्रशने क्रीम लावू लागली. तसा त्यांचा ताठरलेला लवडा मध्ये मध्ये येऊ लागला. सरानी हातानी त्याला धरून ठेवला. नंतर फावडयाने मी त्यांचे शेव्हींग केले. त्यांच्या लवडयाभोवतीचा भाग एकदम तुळतुळीत झाला होता. सर खुश झाले. मग नेहमी प्रमाणेच 69 करून ते मला झवले. हाही एक वेगळाच अनुभव होता. अशा प्रकारे आमचे झवणे चालू होते. मीही त्यासाठी वेडी झाली होती. मला एक प्रकारची चटकच लागली होती. मी वर्गात सराना पहायची आणि माझ्या पुचीत कालवाकालव सुरू व्हायची. कधी एकदा सरांचा लवडा पुचीत घालून घेते, असं मला होऊन जायचं. इतक्या दिवसात सरानी मला वेगवेगळया प्रकारे, वेगवेगळया आसनात झवलं होतं. कधी उभ्याने, कधी वाकवून, कधी मी त्यांच्यावर चढून, तर कधी ते बसून व मी त्यांच्या पुढयात बसून. इ.एकदा असेच झवताना सरांच्या मनात काय आले कोणास ठाऊक? ते म्हणाले, देवयानी, आज तुझी गांड मी मारणार आहे! मला प्रथम काही समजले नाही. मी गप्प बसले. तसे सरानी कपाटातून व्हॅसलीनची बाटली काढली. त्यानी मला वाकविले व ते माझ्या गांडीला व्हॅसलीन लावू लागले. हळूच त्यानी आपलं एक बोट माझ्या गांडीत घुसवलं. तशी मी विव्हळले. अरे बापरे! बोट आत जाताच दुखते, तर मग लवडा आत गेल्यावर काय होईल? मी नको, नको म्हणू लागले. सर कसले ऐकतात? त्यानी व्हॅसलीन आपल्या लवडयालाही लावले. मग माझ्या गांडीच्या भोकावर टेकवून एक धक्का दिला. तसा त्यांचा सुपारा आत गेला. मी जोरात कळवळले. लगेच सरानी लवडा बाहेर काढला. ते म्हणाले, अगं, सुरूवातीला थोडं दुखतं. नंतर बघ मजा येते! तसेच झाले. पुन्हा सरानी जोर देऊन आपला लंड माझ्या गांडीत खुपसला. आता जवळ जवळ त्यांचा अर्धा लवडा माझ्या गांडीत गेला असेल. आता मात्र मला दुखले नाही. हळुहळू धक्के देत सरानी आपला संपूर्ण लंड माझ्या गांडीत घातला. एका हाताने ते माझी स्तनं कुस्करू लागले. आता मलाही मजा येऊ लागली. सर मस्तपैकी माझी गांड मारू लागले. ते तोंडाने बडबडू लागले, हांऽऽहांऽ, ओहोऽऽ! मीही मग सराना साथ देऊ लागले. जोरात, असेच धक्के माराऽऽ! होऽऽ हांऽ, आईऽऽगं. तेवढयात सरांनी त्यांच्या उजव्या हाताने माझा दाणा घासायला सुरूवात केली. मला खूपच मजा येऊ लागली. थोडयाच वेळात माझ्या संपूर्ण अंगात परम सुखाची कारंजी थुई थुई नाचू लागली. होऽऽहोऽऽ सरऽऽ जोरात ऽऽ माझी गांड फाडून टाकाऽऽ! जोरात माराऽऽ आईऽऽगं! मी आलेयऽऽ!! असे ओरडत मी झडले. त्याबरोबर सरानीही आपला वेग वाढविला. तेही झडले. माझ्या गांडीत त्यांच्या गरम वीर्याच्या पिचकाऱ्या सुटल्याचे मला जाणवले. आम्ही दोघंही थकलो होतो. तसेच बेडवर पडून राहिलो. मग मी सराना विचारले, काय हो सर, तुमच्या बायकोचीही गांड तुम्ही मारता वाटतं? तर सर हसून म्हणाले, हो तर! ती रोजच माझ्याकडून गांड मारून घेते. मी थक्कच झाले. हे मग मलाही पटले. खाल्लेलं तोंड आणि झवलेली गांड कधी गप्प बसत नाही! एकदा चटक लागली की ती मारून घ्यावीच लागते. मग मीही रोजच सरांच्या कडून माझी गांड मारून घेऊ लागले.इथ पर्यंत ठीक होते. नंतर मात्र माझ्या जीवनात जे घडले ते कल्पिताहूनही अद्भूत होते. भयंकर होते. मात्र मी एक कठपुतळी बनून जे जे होते ते पाहत राहिले. भोगत राहिले. त्याचे असे झाले. देशमानेसर तसे सिनियर असल्याने संस्थेच्या दुसऱ्या एका शाळेत मुख्याध्यपकांची जागा रिक्त होताच त्यांची नेमणूक होणार होती. मात्र त्यांच्या एका सहशिक्षकाने राजकारण आणून त्यांची जागा हिसकावून घेण्याचा प्रयत्न केला. अशा वेळी सध्याच्या मुख्याध्यापकांची मर्जी राखणे आवश्यक होते. त्याना खुश करणे जरूरीचे होते.एकदा नेहमीप्रमाणेच मी सरांच्या घरी गेले. सर माझीच वाट पहात होते. मी जाताच त्यानी बाहेरच्या खोलीतच नागडी करावयास सुरूवात केली. मला समजेना आज सर बेडरूममध्ये का जात नाहीत ते? बघता बघता मी व सर दोघेही नागडे झालो. तेवढयात सरानी बेडरूमकडे बघथ हाक मारली. सर, बाहेर या! मी उडालेच. आणि पुढच्याच क्षणाला आमचे मुख्याध्यापक मोघेसर बाहेर आले. मला शरमेने मेल्याहून मेल्यासारखे झाले. लगेच मी माझा हात मांडयांमध्ये नेला, तर तो देशमानेसरानी बाजुला केला. एवढयात मोघेसर माझ्या जवळ आले देखील. ते म्हणाले, व्वा! देवयानी, मस्त फिगर आहे हं तुझी!मी काय बोलणार? त्यांचा हात आता माझ्या स्तनांवरून फिरू लागला. मला आता देशमाने सरांचा कावा समजून चुकला. मोघेसराना खुश करण्यासाठी त्यानी त्याना येथे बोलविले होते. मोघेसर देशमानेपेक्षा वयाने मोठे होते. लगेच त्यानी आपली पँटची झिप खोलली व त्यांचा भला मोठा लवडा बाहेर काढला. मला नागडी बघून तो आता ताठरला होता. देशमानेसरानी माझा हात मोघेसरांच्या लवडयावर ठेवला देखील.देशमानेसर म्हणाले, हे बघ देवयानी, आज सराना खुश करून टाक! बीजगणिताची तू अजिबात चिंता करू नकोस. चला सर, आपण बेडरूममध्ये जाऊया. आता आम्ही तिघेही बेडरूममध्ये आलो. मोघेसरही नागवे झाले. आता दोन वयस्क पुरूष व एक शाळकरी मुलगी असे तिघे संपूर्ण नग्न होतो. दोघेही बेडवर बाजुबाजुला आडवे झाले. ते मला त्यांचे लवडे चोखायला सांगू लागले. मी दोन हातात त्यांचे लवडे घेतले व आळीपाळीने चोखू लागले. मोघेसर आनंदाने विव्हळत होते. ते म्हणाले देशमाने, तुम्ही देवयानीला चांगलंच ट्रेन केलंय! मला वाटतं प्रथमच एका लहान माझ्या वयाच्या मुलीकडून मोघेसर लवडा चोखून घेत असावेत. मीही दोन लवडे एकदम चोखण्याचा आनंद घेऊ लागले. मी पाहिले, मोघेसरांची काही झाटे पिकलेली होती.थोडया वेळाने देशमाने सरानी मला बेडवर झोपविले. आता मोघेसर माझ्या मांडयामध्ये आले. माझ्या तंगडया फाकून त्यानी आपले तोंड माझ्या तुळतुळीत पुचीला लावले. माझी पुची कधीची बुळबुळीत झाली होती. आधाशासारखे ते माझी पुची चाटू लागले. तर देशमानेसर माझ्या छातीवर बसले व आपला लवडा माझ्या स्तनांत धरून मागेपुढे करू लागले. आता मोघेसराना कधी एकदा माझ्या पुचीत लवडा घालतो असे झाले होते. त्यानी चटकन तो माझ्या पुचीत सारला व धक्क्यावर धक्के ते मारू लागले. काय दृश्य होते ते! एक म्हातारा माझी पुची झवत होता तर दुसरा माझी स्तनं.तोंडानी ते हांऽ, हूँऽ, हायऽऽ! असे काहीसे बरळू लागले. दोन पुरूषानी मला एकाच वेळी झवण्याचा तो माझा पहिलाच प्रसंग होता.नंतर देशमानेसर माझ्यावरून उठले. तसेच मोघेसरही. देशमानेनी मोघेसराना बेडवर उताणी झोपायला सांगितले. तर मला त्यांच्या लवडयावर बसायला सांगितले. त्यांचा भलामोठा लंड माझ्या पुचीत गपकन शिरला. माझ्या पाठीभोवती हात घालून मोघेनी मला आपल्या छातीशी कवटाळले. तशी माझी गांड वर झाली. देशमाने माझ्यामागे तयारच होते. त्यानी आपला लवडा माझ्या गांडीत सारला. आता ते दोन म्हातारे मला सँडविच बनवून झवू लागले. प्रथमच मी एकाच वेळी माझ्या पुचीत व गांडीत असे दोन दोन लंड घेत होते. मी मस्तीने घुमू लागले. तसेच तोंडाने हाऽऽहूऽ, असे बरळू लागले.नंतर देशमानेसर माझ्यावरून उठले. तसेच मोघेसरही. देशमानेनी मोघेसराना बेडवर उताणी झोपायला सांगितले. तर मला त्यांच्या लवडयावर बसायला सांगितले. त्यांचा भलामोठा लंड माझ्या पुचीत गपकन शिरला. माझ्या पाठीभोवती हात घालून मोघेनी मला आपल्या छातीशी कवटाळले. तशी माझी गांड वर झाली. देशमाने माझ्यामागे तयारच होते. त्यानी आपला लवडा माझ्या गांडीत सारला. आता ते दोन म्हातारे मला सँडविच बनवून झवू लागले. प्रथमच मी एकाच वेळी माझ्या पुचीत व गांडीत असे दोन दोन लंड घेत होते. मी मस्तीने घुमू लागले. तसेच तोंडाने हाऽऽहूऽ, असे बरळू लागले.काही वेळ असे झवल्यानंतर त्यानी आपापल्या जागा बदलल्या. आता मोघेसरांचा लवडा माझ्या गांडीत होता तर देशमानेंचा माझ्या पुचीत. मी कधी झडले ते माझे मलाच समजले नाही. मला मात्र या म्हाताऱ्यांचे कौतुक वाटले. अजूनही दोघे गळत नव्हते. अचानक मोघेसरानी आपला स्पीड वाढवला. हांऽ, होऽऽ, हूऽ! देवयानी, माझ्या लाडके मी आलोऽ, तुझ्या गांडीतऽऽ!! असे ओरडत मोघेसरानी त्यांच्या वीर्याच्या पिचकाऱ्या माझ्या गांडीत सोडल्या. तर देशमानेही बडबडू लागले. देवयानी, माझी रखेल. माझी रंडी, हे घे माझे वीर्य तुझ्या पुचीत. मीऽऽ आलो!! दोघेही म्हातारे आता थकले होते. ते तेथेच लवंडले. मग मी माझी पुची व गांड साफ केली. त्या दोघांना पाणी प्यायला दिले. अशा प्राकारे मोघेसराना खुश करून देशमानेनी त्यांच्या प्रमोशनचा अडसर दूर केला होता. तर माझ्या बीजगणिताचा प्रॉब्लेम.माझे दुर्दैव असे की माझ्या वडीलांचे एक मित्र खान यानी मला व देशमानेसराना मोघेसरांच्या घरातून बाहेर पडताना पाहिले. ते काय समजायचे ते समजून गेले. एकदा अचानक त्यानी मला रस्त्यात आडवले. ते म्हणाले, थांब देवयानी, मी काय सांगतो ते नीट ऐक. मला सर्वकाही समजले आहे. तू , देशमाने व मोघेसर काय करता ते. मी जर हे तुझ्या वडीलाना आणि इतर कुणाला सांगू नये असे तुला वाटत असेल तर तुला माझ्या घरी यावे लागेल. त्यानी आपल्या घरचा पत्ता दिला. तेही माझ्या वडीलांच्याच वयाचे होते. मी काय बोलणार? या म्हाताऱ्यांच्या खेळात मी पुरती फसले होते. तसेच वडीलांच्या प्रतिष्ठेला घाबरत होते. मग मी निमुटपणे खानसाहेबांच्या घरी गेले. त्यांची पत्नी बाहेर गावी गेली होती. ते घरात एकटेच होते.पुन्हा तोच लवडा -पुचीचा खेळ! पुरूष किती चूत पागल असतो आणि ती मिळविण्यासाठी तो कोणत्या स्तराला जातो हे मी आता चांगलेच जाणले होते. मी या तिघांची मुलगीच काय, नात शोभले असते. पण या तिघा झवाडयांनी माझी दैना करून सोडली होती. अर्थात मीही सेक्स एंजॉय करतच होते. एकदा तर या खानने कमाल केली. मला नागव्याने चहा व टोस्ट करण्यास भाग पाडले. ते मी निमुटपणे केले. तर कमाल झाली ती म्हणजे या विकृताने एकदा माझ्या पुचीत झाडूचा दांडा घातला व तशा अवस्थेत त्या झाडूने मला घरात झाडू मारण्यास सांगितले. मी मजबुर होते. मी तेही केले. एक झाले, खानच्या निमित्ताने मी सुंता केलेला लंड पाहिला, त्याबद्दल मी ऐकले होते.मी दहावीची परीक्षा देईपर्यंत हे तिघेही म्हातारे मला येथेच्छ चोदत होते. एकदा आमच्या शाळेची पिकनिक लांब गेली होती. दोन दिवसांचा मुक्काम होता. तेव्हा देशमाने, मोघे व आमच्या शाळेचा एक प्यून या तिघांच्या बरोबर मला थ्रीठ्ठसम करावे लागले होते. त्या प्यूननेही संधीचा फायदा घेत माझी पुची व गांड मारली होती. मी असहाय होते. मजबुर होते. कशीबशी मी दहावीची परीक्षा दिली. आणि त्याच सुमारास माझ्या बाबांची बदली झाली. मी एकदाची सुटले. अशी आहे माझी कथा! आता माझं लग्न झालेले आहे. माझ्या नवऱ्याच्या संसारात मी सुखी आहे!

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